क्या रहा?

उस दिन की गुफ्तगूं में जब
मैं कह बैठी दिल से –
शराफत का ज़माना नहीं रहा,
कोई नादानी का दीवाना नहीं रहा
दिन सुहाना नहीं रहा,
कोई झूठ सच से अंजाना नहीं रहा
ये नहीं रहा, वो नहीं रहा
फलाना ढिमकाना नहीं रहा.. 😛
दिल ने कुछ देर गौर से सुना,
कभी नज़रें मिलायीं, कभी चुरायीं
फिर मासूमियत से पूछा
एक गहरा सवाल – क्या रहा?
सोच में पड़ गयी मैं,
कुछ बोलते ना बना
खुशियाँ-ग़म, सुख-दुःख को
एक तराज़ू में तोलते ना बना
उलझन ही हैं ये सवाल जवाब,
क्या रखा है इन बातों में
खूब झाँका खुद के अंदर,
लेकिन खुद को टटोलते ना बना
क्या रहा, क्या रहा, क्या रहा ? 🤔
उस वक़्त तलाशती रही जवाब..
बिन ढूंढें मिला है आज –
बाकी हैं कुछ ख्वाब
पहले जैसे आसमां छू लेने के नहीं
तो ना सही, मुलाकात करनी है खुद से
अपनी परिभाषा लिखनी है चंद शब्दों में
भले ही लिख ना पाऊं किताब |
