Post # 39

शब्दों की ताक़त

शब्द। बहुत ही ताकतवर होते हैं ये ‘शब्द’। कभी किसी की ज़िंदगी बना देते, कभी किसी को मिटा देते हैं ‘शब्द’। किसी को संवेदनशील, किसी को संवेदनहीन बना देते हैं। इन शब्दों से कभी कोई रिश्ता संवर भी जाता है, कभी दो दिलों में फूट डाल देते हैं। जादू है ना, सोचा है कभी? 

आखिर क्यों कभी-कभी कोई प्यार के 2 मीठे बोल कह दे तो ज़िंदगी की सारी मुश्किलें हल हो गई लगती हैं। और कभी कोई खीझ या गुस्से में 2 शब्द कड़वे बोल जाए तो वही ज़िंदगी बोझ-सी लगने लगती है। यही शब्द ज़रूरत से ज़्यादा मीठे हो जाएं तो ‘चापलूसी’ बन जाते हैं। और ज़रूरत से ज़्यादा कठोर हो जाएं तो ‘खड़ूसपन’।

कुछ लोग महज़ शब्दों के उपयोग की कला सीख कर कामयाब हो जाते हैं। और कामयाब हो कर भी फ़िर प्रेरणादायी शब्दों का प्रयोग कर के बाकी लोगों को प्रोत्साहित करते हैं। जो लोग मूक बधिर होते हैं, शब्दों का उच्चारण नहीं कर सकते, वो इशारों या लिखित में वार्तालाप करते हैं। और शब्दों का अभाव, कभी लोगों में दूरियां बढ़ा देता है, कभी यही शांति समझदारी की निशानी होती है। कभी किसी की कही कोई बात इंसान के साथ-साथ चलती है, मरते दम तक दिलोदिमाग से नहीं निकलती। कभी कोई बात ऐसे ज़ेहन से निकल जाती है जैसे कभी सुनी/पढ़ी ही ना हो।

किसी के पास शब्दों का भंडार हो तो किताबें तक लिख डालता है। वहीं कभी कोई अपनी भावनाओं की व्याख्या करने को तरस जाता है – या तो मौका नहीं पाता है या योग्य शब्द नहीं ढूंढ पाता है। यही शब्द स्कूल-कॉलेज या अन्य परीक्षाओं में भी कितना कमाल दिखाते हैं। कोई पन्ने पर पन्ने भर आता है, कोई बेचारा नाम पते के अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता। उसी के अनुसार परिणाम आता है। “काला अक्षर भैंस बराबर”, “ढाई आखर प्रेम का” सरीखे मुहावरे ले लीजिये, “जो बीत गई सो बात गई” सरीखी कविता या फ़िर भिन्न-भिन्न प्रकार के गीत-गाने, सब शब्दों से पिरोई गईं मालाएं हैं। इसीलिए कभी मनोरंजन का साधन, कभी किसी का कर्तव्य बन जाते हैं चंद शब्द। 

ये सब जानते हुए भी हम क्यों नहीं हमेशा शब्दों का चयन कुशलता से कर पाते हैं? कभी-कभी यही शब्द गलतफहमियां क्यों बन जाते हैं। क्योंकि मनुष्य स्वभाव, अस्थिर मन। कहते हैं तीर की तरह जो शब्द एक बार मुँह से निकलें वह वापस तरकश में डाले नहीं जा सकते। सही बात है, पर कभी-कभी कुछ घाव जो शब्दों के प्रहार से मिले होते हैं, उन पर दूसरे शब्दों का मलहम ज़रूर लगाया जा सकता है। हां, उस वक़्त हमें लगता है ये संभव नहीं लेकिन क्या पता जिसे हमारे शब्दों ने ज़ख़्मी किया है, वो उस मलहम का इंतज़ार ही कर रहा हो। ऐसा नहीं तो ना सही, कम-से-कम हमें तसल्ली रहेगी कि हम ने प्रयास किया। ग्लानि भाव से मुक्ति मिलेगी।

तो क्यों ना आज से एक नई शुरुआत की जाए। जब भी संभव हो, शब्दों का चयन ज़्यादा सावधानी से किया जाए। या किसी को हाल ही में जो शब्दों का घाव हम जाने-अंजाने दे बैठे हैं, उस पर मलहम लगाया जाए। या फिर बस यूंही, कुछ हल्के-फुल्के शब्दों का किसी चुटकुले में प्रयोग कर के किसी अपने को हंसाया जाए। किसी हिम्मत हार रहे व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाए या फ़िर.. सब भूल कर बस अपने लिए ही चंद शब्द कागज़ पर उकेरें जाएं। यक़ीन मानिए, आप को स्वयं ही आनंद की अनुभूति होगी। 😊

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