एक ससुराल ऐसा भी

मुझे बचपन से ही किस्से कहानियां पढ़ने-सुनने का शौक़ रहा है। उस समय मेरी उम्र की ज़्यादातर लड़कियों को परियों की कहानियां बहुत पसंद होती थीं। फ़िर धीरे-धीरे इस शौक पर हावी हो गया टीवी देखने और रेडियो सुनने का शौक़। लेकिन मेरी पसंद की सामग्री का भाव अब भी वही था। उन दिनों मेरे पसंदीदा फिल्मी गानों में से एक था वो गाना जिस के बोल कुछ इस तरह थे –
ओ मेरे सपनों के सौदागर, मुझे ऐसी जगह ले जाओ
मैं चाहती हूं मेरे हमसफ़र, मुझे परियों की दुनिया दिखाओ
प्यार ही प्यार हो जिस जगह, मुझे ऐसा जहां दिखाओ
कभी-कभी मैं अकेले में इस गाने को गुनगुनाते हुए बिस्तर पर खड़े हो कर 2 कदम भी थिरका लेती थी 😄
दोस्त-परिवार सब साथ थे, बहुत प्यार था, फिर भी पता नहीं क्या तलाश रहा था मेरा मन। फिर धीरे-धीरे पढ़ाई का भार बढ़ गया, होमवर्क और परीक्षाओं की चिंता को पीछे छोड़ते हुए नई चुनौतियां आईं, नए शौक, नई उलझनें और देखते ही देखते सब बदल गया। जोश-जोश में ग्रेजुएशन के लिए घर से बाहर निकल तो गई पर बड़ी चकाचौंध थी। सब में होड़ लगी थी एक दूसरे को नीचा दिखाने की। जल्दी ही महसूस होने लगा था कि गलत जगह आ गई। कॉलेज के बाहर भी कुछ लोग मिले जिन्होंने लगभग ये साबित ही कर दिया कि बस अब इस दुनिया में किसी की भावनाओं की कोई कद्र नहीं। सब बेकार की बातें हैं। किसी तरह कॉलेज खत्म कर के नौकरी की तलाश में निकली तो एहसास हुआ कि मेरा आत्म-विश्वास ज़ीरो से भी नीचे, एकदम नकारात्मक में पहुंच चुका है। और मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनी मेरी अपनी ईमानदारी। लेकिन ये मेरी उन खामियों में से एक थी जिन पर मैं चाह कर भी काम नहीं कर पा रही थी। कभी झूठ और बेईमानी की कोशिश भी की तो नतीजा चाहे कुछ भी रहा हो, खुद ही इतना ग्लानि भाव से भर गई कि वापस जस-की-तस। साथ ही, अपनी एक नई कमी पता चल गई थी मुझे कि ‘मुझे लोगों की पहचान नहीं है’। जिसे देखो उसी की ‘थाली’ में मुझसे ज़्यादा ‘घी’ लगता था। और अगर नहीं भी लगता था तो लोग कह-कह कर महसूस करवाते थे। कई बार नौकरी मिली या किसी शुभचिंतक ने लगवाई भी लेकिन टिकी नहीं तो सब को लगने लगा कि मैं हार जल्दी मान लेती हूं यानी ‘गिव-अप’ जल्दी कर देती हूं। मैं उस के बाद भी कोशिश करती रही लेकिन एक समय पर आ के लगा बस अब कम-से-कम एक ब्रेक तो चाहिए ही, चाहे उस के बाद फ़िर से कोशिश करूँ। फिर 2-3 दूसरे क्षेत्रों में प्रयास किया लेकिन सब नाकाम। उधर विवाह-योग्य वर की तलाश शुरू हो गई थी। खामियां इस कदर हावी थीं मुझ पर कि इस में भी लंबे समय तक निराशा ही हाथ लगी। कभी कहीं बात बनती-सी लगी भी तो बस दिल नहीं माना कि यही व्यक्ति चाहिए। प्राथमिकताओं की फेहरिस्त लंबी तो थी पर पापा की समझाई बात भी दिमाग में थी कि कहीं-ना-कहीं समझौता करना ही पड़ता है, सब में सब कुछ नहीं मिलता। सब को भले ही लगता होगा कि मैं हार जल्दी मान लेती हूं लेकिन मेरी जंग जारी थी।
फ़िर मुलाकात हुई इस इंसान से जो अब मेरे पति हैं। पहली बार बात होने के बाद मैंने सब से पहले तिकड़म भिड़ा के अपने तरीके से बस ये पता लगाया कि इस नाम और पते के साथ ऐसा व्यक्ति वास्तव में है यानी मक्कार-धोखेबाज़ नहीं है। फ़िर भी थोड़ा झिझक रही थी लेकिन जब मुझसे पहली बार बात होने के बाद तीसरे दिन में ही उन्होंने घरवालों को मनाना शुरू कर दिया तो मुझे यकीन होने लगा। मैं अपनी खामियां उन्हें शुरू से ही बताती चल रही थी पर वो इतने सकारात्मक थे कि मुझ में सब अच्छा ही लग रहा था। मुझे तो खुद भी उस समय खुद में कोई खूबी नहीं दिखती थी। खैर, बात बढ़ी, हम सपरिवार मिले और शादी भी हो गई। गौरतलब है कि कोई खास बैकग्राउंड चेक ना ही उन की तरफ से हुआ, ना ही मेरी। सोचा भी तो ज़रूरत ही नहीं लगी। शायद वजह ये थी कि चाहे ज़िंदगी में कुछ भी हुआ हो, उस अदृश्य शक्ति पर से विश्वास नहीं उठा जो दुनिया चला रही है। चाहे उसे कुछ भी कह लीजिए – भगवान, अल्लाह, जीसस इत्यादि।
अब आई ससुराल में। संयुक्त परिवार, जिस से पूरी तलाश में हमेशा बचती रही। लेकिन इस व्यक्ति से मिल कर लगा कि बस सब मंज़ूर है। और आख़िर वह मेरी इतनी सारी कमियां स्वीकार कर रहे थे तो ये मेरे ख्याल से कोई बड़ी बात नहीं थी। बल्कि परिवार मिल कर अच्छा लगा तो इसे समस्या मान कर नहीं बल्कि खुशी-खुशी अपना लिया। ये और बात है कि फ़िर एक नई तरह का संघर्ष शुरू हुआ जो दो विपरीत बैकग्राउंड की मान्यताओं के टकराने से उत्पन्न हुआ था। अब नई तरह की चुनौतियां थीं। कुछ गलतफहमियां हुईं, कुछ मुश्किलें। पर एक बात थी, कि सब के दिल में सद्भाव था। इन लोगों के अंदर भी और मेरे भी। कुछ शारीरिक परेशानियां अभी भी ऐसी हैं जिन का किसी की मान्यता से कोई लेना-देना नहीं। पर अब अंततः हम सब साथ हैं। सब इस बात को समझ गए हैं कि सब का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। और सभी अपने साथ-साथ सब की प्रथमिकताओं का ध्यान रखते हुए सामंजस्य बना कर चल रहे हैं। ऐसा ससुराल जहां रीति-रिवाज तो सब हैं पर गुरूर नहीं। जिन्हें कोई अपना फर्ज़ मान कर कुछ देना भी चाहे तो पहले मना ही करते हैं। फ़िर बहुत निवेदन पर दिल रखने के लिए लें लें तो और बात है। और ये सब महज़ औपचारिकता नहीं, भलाई है। और हिम्मत की बात करें तो सब से ज़्यादा वीर मेरी सासु मां हैं जो खुद गंभीर परेशानी से जूझते हुए भी सब का ख़याल रखती हैं और शिकायतें दूर करने की कोशिश में रहती हैं क्योंकि सबसे ज़्यादा नर्मदिल भी वही हैं। हम सब से ज़्यादा आसानी से गलतियां माफ़ कर देती हैं। यहां किसी आम सुसराल की तरह खाने-पीने की कमी होने की बजाए डांट इस बात पर पड़ती है कि कम क्यों खाती हो। 😄 पहनने-ओढ़ने में भी अब मेरी ही रुचि कम हो गई है (क्योंकि प्राथमिकताएं बदल गई हैं) वरना उस में भी कोई कसर नहीं थी। जॉब करने का ना प्रेशर है, ना ही मनाही। ससुरजी भी ज़रूरत में अपना औहदा और अहम भूल कर सब को सहारा देते हैं। जहां जेठ में जेठ जी वाला रौब नहीं और जेठानी भी जिम्मेदारियों से आगे बढ़ कर सब का ख़याल रखती हैं, वो भी साथ-साथ आर्थिक रूप से मजबूत सहारा लगाते हुए। और एक छोटा प्यारा-सा बच्चा जो पहले बहुत शरारतें करता था क्योंकि मुझे आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहा था पर अब इतना समझदार हो गया है कि चाची बस दोस्त ही हो गई है। 😄
इस के साथ ही, रिश्तेदारों के स्वभाव में भी प्यार और परवाह की गर्माहट है। शादी तय होते ही जिस तरह हमारी पीढ़ी के सदस्यों ने सोशल मीडिया के जरिये ही शुभकामनाओं की बौछार कर दी थी वो भूलने वाली बात नहीं। उस के बाद भी छोटों से इज़्ज़त मिलती रही और बड़ों से प्यार। हां, शुरू-शुरू में परिवार के कुछ बड़ों से थोड़ी गलतफहमियां हो गईं थी लेकिन अब सब पहले से बेहतर है। और जल्द ही बेहतर होने की उम्मीद है। भविष्य तो किसी ने नहीं देखा कि कब क्या होना लिखा है। पर फ़िलहाल तो बस यही लगता है, जैसे कि उस गाने में आगे की पंक्तियां थीं –
ये परियों की बस्ती, सितारों का मजमा
यहां गूंजता है, मोहब्बत का नग़मा
यहां प्यार के हैं दीवाने सभी
चाहत ही सब कुछ यहां
लेकिन मुझे सब में ये खूबियां अगर दिख रही हैं और छोटी-मोटी मुश्किलें होते हुए भी अगर मेरे लिए ये सब ज़्यादा मायने रखता है तो इस का श्रेय जाता है मेरे पति को। जिन्होंने मुझे मन की शांति का कई बार गहराई से एहसास करवाया और ये भी यकीन दिलाया कि प्यार किसी एक व्यक्ति से नहीं होता। जब सच्चा प्यार होता है तो सब से होता है, सब कुछ अच्छा लगता है और सभी के लिए मन में सद्भाव होता है। सही-गलत के नए मायने सिखा दिए मुझे। पति की शख़्सियत पर कहने के लिए अलग से लेख लिखना होगा या शायद पुस्तक। 😄
अभी इस विषय पर इतना ही। निष्कर्ष के रूप में कहना चाहूंगी कि ससुराल अगर ऐसी हो तो क्यों ना कुंवारी कन्याएं फ़िर से संयुक्त परिवारों में रुचि दिखाने लगें? फ़िर से लौट आएं वो ज़माने जहां भौतिक वस्तुओं से ज़्यादा महत्व अपनापन रखता था।
लेकिन हां, फ़िर अपनी नज़र में भी वो परख होनी चाहिए कि अच्छे-बुरे की पहचान हो और अपनी भी मूल-प्रकृति में भलाई होनी चाहिए। चाहे जीवन-संघर्ष के चलते आप ने नकारात्मकता की परत ओढ़ ली हो।
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धन्यवाद 🌹
