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Post # 35

हाँ, मैं गलत हूँ

हाँ, मैं लगती ठहरी नदी हूँ,
भीतर शायद एक सदी हूँ..

सच है, जीवन एक छलावा..

जो दिखती पूरे होश में है,
ऐसी शायद एक मदी हूँ..


बादल की गरज में जो थमी है,
हाँ, मैं शायद वही नमी हूँ

सच है, पास हूँ तो पूरी नहीं

पर दूर हो तो अधूरा कर जाए,
ऐसी शायद एक कमी हूँ..


नहीं हूँ वो पानी जो,
जिस बर्तन में हो, ढल जाये

सच है, नहीं आता रंग में घुल जाना

पर अक्सर प्यासे को देख,
जो दयावान सी पिघल जाए

मैं.. शायद ऐसी बर्फ़ जमी हूँ..


नहीं हूँ वो पंछी जो,
नभ में पर फैलाये विचरता है

फिर भी, स्वच्छंद हूँ

मैं वो जीव हूँ जो
अंततः धरती पर ही आ के ठहरता है


मैं एक पुकार हूँ,
कभी धिक्कार, कभी सत्कार हूँ..

नहीं हूँ समय सी प्रगतिशील

हाँ मैं शायद ब्रह्माण्ड सी अटल हूँ..


अभावी है व्यक्तित्व मेरा
मेरे हर पहलू में कमी सही..

पर फिर, कौन है यहां जो दोषी नहीं?
कौन है जिस ने कभी कोई भूल की नहीं


ये सब जान के भी जो कभी..
अपने ही पक्ष में ना हुआ, मैं वो मत हूँ

क्या पाया है जग ने सही हो कर?
हाँ.. मैं तो गलत हूँ..

हाँ, मैं गलत हूँ |