Post # 8

एक कहानी

अभी नई है, नहीं पुरानी,

सोने की चिड़िया की कहानी |

अनेकों में एकता की निशानी,

लाखों वीरों की क़ुरबानी |

एक समय था अंग्रेजों ने,

उड़ती चिड़िया को पकड़ा था,

ना समझा ना जाना इसको,

जंजीरों में जकड़ा था |

वो समझे थे वो जो उनकी,

घोर ग़लतफहमी थी,

ये कि चिड़िया उनकी क़ैद में,

खूब डरी और सहमी थी |

ना दाना ना पानी इसको,

उन जुल्मियों ने डाला था |

जाने क्यों, किस बात का जाने,

इस पर बैर निकला था |

नहीं चली पर उनकी एक भी,

ये तो बात यक़ीनन थी,

शौर्य, वीरता और बहादुरी,

जैसे इसकी परिजन थीं |

बहुत ज़ख्म और बहुत-सी चोटें,

इस प्रतिद्वन्द में खायी थीं |

तब भी सत्य और अहिंसा,

जैसी भी नीति अपनाई थीं |

आखिर इक दिन फिर वो बंधन,

टूट गया और चूर हुआ..

उस दिन फिर से इस चिड़िया ने,

अपने पर यूँ खोले थे |

अंग्रेजों ने चुप्पी साध ली,

फिर न वो कुछ बोले थे |

आज वो दिन है कि सोने की

चिड़िया आकाश को छूती है |

इसको कोई छीन ना पाए,

ये तो अपनी विभूति है.. |

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