एक कहानी

अभी नई है, नहीं पुरानी,
सोने की चिड़िया की कहानी |
अनेकों में एकता की निशानी,
लाखों वीरों की क़ुरबानी |
—
एक समय था अंग्रेजों ने,
उड़ती चिड़िया को पकड़ा था,
ना समझा ना जाना इसको,
जंजीरों में जकड़ा था |
—
वो समझे थे वो जो उनकी,
घोर ग़लतफहमी थी,
ये कि चिड़िया उनकी क़ैद में,
खूब डरी और सहमी थी |
—
ना दाना ना पानी इसको,
उन जुल्मियों ने डाला था |
जाने क्यों, किस बात का जाने,
इस पर बैर निकला था |
—
नहीं चली पर उनकी एक भी,
ये तो बात यक़ीनन थी,
शौर्य, वीरता और बहादुरी,
जैसे इसकी परिजन थीं |
—
बहुत ज़ख्म और बहुत-सी चोटें,
इस प्रतिद्वन्द में खायी थीं |
तब भी सत्य और अहिंसा,
जैसी भी नीति अपनाई थीं |
—
आखिर इक दिन फिर वो बंधन,
टूट गया और चूर हुआ..
—
उस दिन फिर से इस चिड़िया ने,
अपने पर यूँ खोले थे |
अंग्रेजों ने चुप्पी साध ली,
फिर न वो कुछ बोले थे |
—
आज वो दिन है कि सोने की
चिड़िया आकाश को छूती है |
इसको कोई छीन ना पाए,
ये तो अपनी विभूति है.. |

