Post # 17

किस ओर..?

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अपने मन के..समंदर के..
तूफ़ां से जैसे खेल रही हूँ मैं..
इस में उलझी वो कश्ती हूँ.. कि जो..
हंस के इस को झेल रही हूँ मैं..

—-

न था कभी बंधन तो कोई..
फ़िर भी न जाने किन गिरहों से ऐसे खुल रही हूँ मैं..
दिल का दरिया कहूं या आंखों में सैलाब, पता नहीं..
बस ये जानती हूं कि जाने अन्जाने इस में घुल रही हूँ मैं..

—-

कौन हूँ और क्या हूँ,
इस अजनबी लम्हे में अपना वजूद ढूंढती हूँ मैं..
बस जो है यही है और यहीं है..
इसी अनचाहे सच को अपना कर..
विलाप कर, थक-हार कर..
भी जाने क्यों चल रही हूँ मैं..
किस ओर बढ़ रही हूँ मैं..
क्या वाकई, अब भी ज़िंदा हूँ मैं?
—-

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