Post # 18

वो

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अलबेली, अनसुलझी पहेली-सी वो..

—

पहले झरनो-सी बहती थी,

अब बहने से कतराती है..

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पहले खिलखिला कर हंसती थी,

अब हंसने वाली बात पर बस मुस्कुराती है

—

पहले बखूबी तितलियाँ पकड़ लिया करती थी,

अब रंग देख ललचाती है..

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पहले महफ़िल की जान हुआ करती थी,

अब तन्हाइयों से बतियाती है..

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क्या करे, किस से अपनी दास्तान कह भी दे वो,

किसी से दिल की बात कहने को तरस जाती है..

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यूँ तो कमी नहीं जिंदगी में सुख की और खुशियों की पर,

देखें तो इन का अहसास ही कहाँ कर पाती है..

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पहले कितने सपने होते थे उन झील-सी आँखों में,

अब तो बस जब भी मौका मिले उन्हें छलकाती है..

—

ऐसा आख़िर क्या हो गया है उसे,

ना जाने क्या-क्या सहा, किस दौर से गुज़री होगी वो,

ये सोच कर भी हमारी तो रूह काँप जाती है |

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