
गुफ्तगूं
🙂 दिल, छोड़ दे अब ये मासूमियत,
कि शराफ़त का वो ज़माना नहीं रहा..
जिस कारवां को नाज़ होता था तुझ पर,
उस में कोई नादानी का दीवाना नहीं रहा..
कहते हैं सब, होने लगी है शब,
उम्मीद भरा वो दिन सुहाना नहीं रहा..
नकाबों के इस दौर में, हर चेहरे पे पर्दा है,
झूठ कोई, इस सच से अंजाना नहीं रहा..
अपने हैं ख्वाब और जैसे बस ख्वाब ही अपने हैं,
इन में से एक भी बेगाना नहीं रहा..
🤔 पर फिर.. वो दिल भी क्या, जिस में,
दुनिया भर के ग़म का ठिकाना नहीं रहा..
नासमझी नहीं रही, मासूमियत नहीं रही,
अपने पराये का अफसाना नहीं रहा |

