कुछ सवाल
अपनों को, अपनेपन को,
अपने आप को भुला के,
क्यों परायों की भीड़ में खो रहे ?
अन्याय, आक्रोश, आवेश की आग में,
क्यों शब्द-मतलब को झोंक रहे?
—
ना जाने कहाँ उड़ गए,
जीवन से खुशियों के रंग,
ना नियम, ना कायदा,
शीघ्रता की आड़ में सभी कुछ भंग |
—
किस मोड़ पर ले आई,
धक्के मार के ये भीड़ |
जाने किस आग ने जला दिए,
उड़ते पंछियों के नीड़ |
—
जीवनदाता आज अपने ही,
अंश से नहीं निडर,
जाने कहाँ ले के जाएगी,
मानवता को ये डगर |
—
दौलत-शोहरत है तो है,
वरना नहीं इंसान बड़ा |
जाने कब-कैसे भरेगा,
पापों का अदृश्य घड़ा |
—
धर्म, लिंग, जाति, जनजाति,
के नाम पे खुद को बाँट रहे |
बढती जनसंख्या, बढ़ता खतरा,
क्योंकि वृक्षों को खुद ही काट रहे |
—
घट रहा बचपन,
बंद हुए खेल |
बच्चा बच्चा जाने अब,
क्या है Facebook क्या Gmail |
—
रिश्ते-नातों की दुनिया से निकलकर
स्वार्थ के सागर में खुद को डुबो रहे |
क्यों हम इंसानियत खो रहे?
हम क्यों इंसानियत खो रहे?


Agree…
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kafi gehri soch or kadva sach….
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