Post # 12

झटपट

सुबह के 6 बजे
ये कैसा शोर ‘हाय राम!’
आँख खुली तो हम ने देखा
बज रहा था फ़ोन में अलार्म!
—-
हम ने आँखें मसलीं, करवट बदली,
और, 5 मिनट को और सो गए |
इस बार जगे तो सन्न रह गए,
उफ़! थे पौने 7 हो गए |
—-
फिर जो हम ने बिस्तर कूद के
सरपट दौड़ लगाई थी |
मजबूर हुए थे, करते भी क्या जब
जान पर बन आई थी |
—-
बिजली के जैसे पेस्ट किया
और ध्वनि की गति से नहाए थे |
किसी तरह से दौड़-भाग कर
सारे काम निबटाये थे |
—-
चलने लगे तो अचरज हुआ कि
माँ आज अब तक सो रही थी |
पड़ोसियों के भी थे कुछ तेवर बदले
अजीब-सी उलझन हो रही थी |
—-
खैर, हम ऑटो में बैठ कर
इस दुविधा से बाहर हो गए
क्या चल रहा है किस सीरियल में,
इस उधेड़-बुन में खो गए थे |
—-
ऑफिस के जब गेट पे पहुँचे
तो देखा वहाँ सुन्सान था |
इधर-उधर भी नज़र घुमाई
पर नहीं दिखा कोई पहचान का |
—-
हम ने झट से फ़ोन निकाला
कैलेंडर बटन दबाया था |
तारीख देख कर दंग रह गए
हाय! इतवार आया था |
—-
खुद को हल्का चपत लगाया,
छूट रही अपनी ही दबी हँसी थी |
उफ़! बेकार रहा आज का आना
ये कैसी मुसीबत आन पड़ी थी |
—-
घर पहुँचे तो माँ बाहर ही
कर रही इंतजार थी |
सब को जब ये किस्सा सुनाया
तो फूट पड़ी हँसी की फुहार थी | 🙂

Post # 11

‘ओह माय गॉड!’ फिल्म और मेरा नज़रिया

     नहीं, आप गलत मत समझिये | यह मेरा नज़रिया इस फिल्म के बारे में नहीं, बल्कि भगवान के अस्तित्व के बारे में है | मैंने बचपन में कहीं एक कहानी पढ़ी थी | वो मेरी ज़िन्दगी की उन कहानियों में से एक रही जो सिर्फ कागज़ के टुकड़ों पर छपे चंद शब्द ना हो कर, किसी का विश्वास बन जाती हैं, किसी के मन-ओ-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं | उस कहानी में लिखा हर वाक्य तो मुझे जस-का-तस याद नहीं है,पर उस का निचोड़ याद है, और वही मेरा विश्वास है | वह कहानी कुछ इस प्रकार है :

     एक बच्चे को चोरी करने की बुरी आदत पड़ जाती है | एक बार वो चोरी करता हुआ पकड़ा जाता है | फिर उसे इस की सजा मिलती है | डांट भी पड़ती है और मार भी | लेकिन इससे वो सुधरता नहीं, बस चोरी करते समय पहले से ज्यादा सतर्क हो जाता है | अगली बार जब वो चोरी करने में सफल हो जाता है, तो खूब खुश होता हुआ घर जाता है | घर जा कर देखता है तो उस के पिताजी को पता चल चुका होता है और वो उस का इंतज़ार कर रहे होते हैं | उसे देख कर वो तिलमिला जाते हैं और पहले उस पर खूब क्रोधित होते हैं | इतना, कि वो बच्चा रो देता है | फिर उन के थोड़ा शांत होने पर वो अपने पिताजी से पूछता है “पिताजी, मानता हूँ मैंने चोरी की | पर जिस वक़्त मैं ये कर रहा था, उस वक़्त वहाँ कोई नहीं था | फिर आपको पता कैसे चला?” इस पर उसके पिताजी कहते हैं “बेटे, तुम्हें लगता है की तुम्हें चोरी करते हुए किसी ने नहीं देखा | पर सच ये है कि तुम्हें उस ने देखा जो सर्वत्र है, चाहे वो तुम्हें दिखे या नहीं | तुम्हें भगवान् ने देखा है बेटा | मुझे कैसे पता चला,वो छोड़ो पर ये याद रखो की वो सब जगह है और सब कुछ देख रहा है |” इस घटना के बाद बच्चा सुधर जाता है | चोरी करना छोड़ देता है |

     चूंकि यह कहानी मैंने बचपन में पढ़ी थी और मुझे याद रही, इसलिए तभी से ये मेरा विश्वास बन गई | मेरे परिवार में आप को दोनों तरह के लोग मिलेंगे — भगवान् में मानने वाले भी और ऐसे भी जो दिल के तो अच्छे हैं पर भगवान् को ज्यादा नहीं मानते | मेरे पास बचपन से दोनों ही रास्ते थे चुनने को — चाहे तो मैं भगवान् में मानूं, चाहे तो नहीं | पर मेरा मानना ये है कि भगवान् सभी जगह है, लेकिन उसे किसी एक मूर्ती या तस्वीर में सीमित रखना मुमकिन नहीं है | ‘वो’ सब कुछ देख रहा है | और वही दुनिया चला रहा है | बचपन से ही मेरे इस विश्वास पर अनेकों सवाल उठे हैं पर मैं किसी को इस से सहमत नहीं कर पाई | आस्तिक मुझसे पूछते हैं ‘भगवान् को मानते हो तो पूजा क्यों नहीं करते?’ और नास्तिक पूछते हैं ‘अगर भगवान है तो दुनिया में गलत क्यों हो रहा है?’ और मैं सब से बस यही कह पाती कि मैं आप लोगों से ये नहीं कह रही कि जैसा मैं सोचती हूँ वैसा ही आप भी सोचिये | मुझे बस इतना पता है कि मेरा ये विश्वास मुझे गलत रास्ते पर जाने से रोकता है और मेरी हमेशा यही कोशिश रहती है कि मैं किसी के साथ गलत न करूँ | मैं ये नहीं कहती कि इस विश्वास के चलते मैंने कभी कोई गलती नहीं की | मैं भी इंसान हूँ और मुझसे भी गलतियां हुई हैं लेकिन फिर भगवान् के सर्वत्र होने से ये हुआ है कि मुझे अपने हर अच्छे-बुरे कर्म का फल भी मिला है — गलत का बुरा और सही का अच्छा | यदि तब भी किसी के पास मेरे विश्वास को काटने के लिए कोई तर्क है, तो वह यह फिल्म देखे | बचपन में मैं अन्जाने में ही रोज़ भगवान् का ध्यान करती थी | पूजा नहीं करती थी पर रोज़ सोने से पहले मन-ही-मन भगवान् से बात करती थी | कल्पना करती थी कि मैं एक लैंडलाइन फोन पर ‘B-H-A-G-W-A-A-N’ या ‘भ-ग-वा-न’ डायल कर के उन से बात कर रही हूँ | जैसे-जैसे बड़ी हुई तो कुछ अत्याधिक व्यस्तता के कारण और कुछ परिस्थितियों के चलते यह क्रम टूट गया | अपनी शुरुआती युवावस्था में मैंने बहुत बुरा वक़्त भी देखा | लेकिन मेरा ‘उस’ पर से विश्वास नहीं उठा | मैंने हमेशा यही माना कि वो मेरी परीक्षा ले रहा है और मुझे मेरी गलतियों का एहसास करवा रहा है | और धीरे-२ उन गलतियों को सुधार कर मैं पहले कि तुलना में अधिक समर्थ और मानसिक तौर पर मज़बूत हो गई हूँ | आज भी..पूजा-अर्चना करना तो मेरी दिन-चर्या में शामिल नहीं है, लेकिन मैं अपने हर अच्छे-बुरे वक़्त में भगवान् को याद करती हूँ | क्या ये ज्यादा ज़रूरी नहीं है ?  और यदि आप जानेंगे कि मेरे मस्तिष्क में भगवान की छवि क्या है, तो शायद आप यकीन नहीं करेंगे | मैं जब अपनी आँखें बंद कर के ‘उन्हें’ याद करती हूँ तो वे मुझे शर्ट-पैंट पहने एक बुज़ुर्ग के रूप में दिखते हैं | और शायद इसीलिए इस फिल्म ‘ओह माय गॉड!’ में भगवान् को जो रूप दिया गया है वो मुझे बेहद भाया | नहीं, इसलिए नहीं कि वो अभिनेता अक्षय कुमार हैं और मैं उन पर फ़िदा एक लड़की | बल्कि इसलिए कि वो रूप ये दर्शाता है कि भगवान् हमें कभी भी, कहीं भी, किसी भी रूप में मिल सकता है | और उसे पहचानने के लिए हमें कोई दिव्य-दृष्टि नहीं चाहिए, बस एक साफ़ दिल और थोड़ी सद्बुद्धि चाहिए | कुछ लोग सवाल करते हैं कि ‘अगर भगवान् है तो इतनी समस्याएं क्यों हैं?’ उनके लिए फिल्म का वो डायलॉग है जब भगवान् कहते हैं ‘हमारा काम है रास्ता दिखाना, मंजिल तक पहुंचना तुम्हें है |’ जो लोग ये पूछते हैं कि ‘अगर भगवान् अच्छे कर्मों का फल देता है, तो देने में इतनी देर क्यों लगता है?’ उन के लिए फिल्म के एक डायलॉग में इस कहावत का उपयोग किया गया है कि ‘भगवान् के घर देर है, अंधेर नहीं |’ जब फिल्म में कान्जी भाई को पैरालिसिस का अटैक आता है तो डॉक्टर का डायलॉग है ‘इन्हें अब भगवान् ही बचा सकता है’ | यह दर्शाता है की परेशानियों में हम ‘उसे’ कोसते ज़रूर हैं लेकिन अन्जाने में हम उस पर निर्भर भी बहुत करते हैं | ‘मेरे निशाँ’ गाने में जिस तरह भगवान् का चित्रण किया गया है वह सटीक है | आज अगर भगवान् साक्षात रूप में यानि भगवान् ही बन कर हमारे सामने आयें तो ‘वो’ भी कुछ ऐसा ही सोचेंगे ‘मैं तो नहीं हूँ इंसानों में..बिकता हूँ मैं तो बस दुकानों में..दुनिया बनाई मैंने हाथों से..मिट्टी से नहीं जज़्बातों से..फिर रहा हूँ ढूंढता..मेरे निशाँ हैं कहाँ?…मेरे निशाँ..’ | इस गाने में जिस तरह भगवान् को चलते-फिरते परोपकार करते हुए दिखाया गया है, अगर वैसा ही कभी-कभार हम भी करें तो क्या इस से ये साबित नहीं होता कि हम में भी भगवान् है?

     एक बार इस विषय पर चर्चा करते हुए किसी ने मुझसे ये भी कहा था कि लोग मूर्ती-पूजा इसलिए करते हैं ताकि ध्यान-केन्द्रित कर के ‘उसे’ याद कर सकें | मैं इस विचार का आदर करती हूँ, पर साथ ही ये भी पूछती हूँ की अगर वही ध्यान-केन्द्रित मैं मूर्ती-पूजा के बिना कर रही हूँ और अपने हर अच्छे-बुरे में ‘उसे’ याद कर रही हूँ, तो क्या ये मेरी ‘उस’ में श्रद्धा नहीं है? नहीं, मैं आर्य-समाजी नहीं हूँ और ना ही आर्य-समाज को बढ़ावा दे रही हूँ | ये मेरा निजी विश्वास है और मुझे व्यक्तिगत तौर पर मजबूती देता है | हो सकता है आप कहें कि ‘उसे’ याद करने का सबका अपना-अपना तरीका होता है..लेकिन मुझे मूर्ती-पूजा करने वालों से कोई शिकायत नहीं है और ना ही मैं उन का विरोध कर रही हूँ पर मैं ये कहना चाहती हूँ कि अति हर चीज़ की बुरी होती है | और इसलिए ये पूजा-अर्चना भी यदि अति हो कर ढोंग बन जाये, तो ये गलत है | अगर आप अपनी पूजा के लिए किसी दूसरे प्राणी को कष्ट दे रहे हैं तो ये गलत है | ‘ओह माय गॉड!’ फिल्म में कान्जी भाई ने अदालत में जो दलीलें दी हैं, उन में से कई से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ | हालांकि सारी दलीलों का यहाँ उल्लेख करना और उन पर अपनी प्रतिक्रिया देना, ना तो संभव है और ना ही आवश्यक, पर मैं ये कहूंगी कि इस विषय में और गहराई से सोचने के लिए आप एक बार ये फिल्म ज़रूर देखें और तब मेरी बातों पर गौर करें | और फिर उस आधार पर भगवान् के बारे में अपने नज़रिए का विश्लेषण करें और आवश्यकतानुसार फेर-बदल  खुद करें |

     अंत में मैं बस यह कहना चाहूंगी कि इस फिल्म को देख कर ऐसा लगा जैसे कि इस विषय में मेरी विचारधारा को किसी ने ठोस रूप दे दिया | मेरा सलाम है उस व्यक्ति को जिस के दिमाग में सब से पहले ये कॉन्सेप्ट आया | और ‘ओह माय गॉड!’ फिल्म की पूरी टीम को ऐसी लाजवाब फिल्म बनाने के लिए बधाई |

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयः॥
सर्वे भद्राणि पस्यन्तु। माँ कश्चित् दुखभागभवेत॥
(सभी खुशी से रहें, सभी अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लें |
सभी शुभ देखें, कोई भी संकट का अनुभव ना करे)

Post # 10

क्या लिखूं ?

हजारों कौंधते ख़याल ज़ेहन में,

सोच रही थी आज लिखूं..

अरसे बाद ये दिल में आया,

छोड़ के सारे कामकाज लिखूं |

पर लिखने बैठी तो उलझ गयी कि

अपने दिल के राज़ लिखूं,

या राजनीति की चहल-पहल में

क्या चल रहा आज लिखूं?

कौन से खेल में आज देश को,

फिर हुआ युवाओं पर नाज़ लिखूं,

या..फिर एक नेता को ले कर

किसी घोटाले का हुआ पर्दाफाश लिखूं?

विज्ञान में आई कोई नई क्रांति,

खेती के लिए नई खाद लिखूं,

या..युवा पीढ़ी में छा रहे

फिर किसी नए पेय का स्वाद लिखूं?

कितनी हत्याएं, दुर्घटनाएं,

कितने रेप हुए आज लिखूं,

या..फिर किसी व्यापारी की एक पहल से

हिल गए तख़्त-ओ-ताज लिखूं?

इसी सोच में डूबी थी कि

पल-दो पल को आँख लग गयी |

आँख खुली तो चादर तान ली,

सोचा कुछ दिन बाद लिखूं |

Post # 9

Disastrous Subjects

 At first comes social,
It extends and extends,
Next is chemistry,
No end of its ends.

Now about English,
It is always dramatical.
And regarding Music?
Its something very devotional.

Then we count Drawing,
It needs some imaginations,
When think about Hindi,
We get bored of its explanations.

Then comes Physics,
Oh ! Its formulas and equations..
Don’t ask about Maths !
To get good marks in that,
We have no expectations.

Oh, Sanskrit is left out !
We have to learn slokas always,
And last but not least – Biology,
Just definitions…
Nothing more, nothing less.

Post # 8

एक कहानी

अभी नई है, नहीं पुरानी,

सोने की चिड़िया की कहानी |

अनेकों में एकता की निशानी,

लाखों वीरों की क़ुरबानी |

एक समय था अंग्रेजों ने,

उड़ती चिड़िया को पकड़ा था,

ना समझा ना जाना इसको,

जंजीरों में जकड़ा था |

वो समझे थे वो जो उनकी,

घोर ग़लतफहमी थी,

ये कि चिड़िया उनकी क़ैद में,

खूब डरी और सहमी थी |

ना दाना ना पानी इसको,

उन जुल्मियों ने डाला था |

जाने क्यों, किस बात का जाने,

इस पर बैर निकला था |

नहीं चली पर उनकी एक भी,

ये तो बात यक़ीनन थी,

शौर्य, वीरता और बहादुरी,

जैसे इसकी परिजन थीं |

बहुत ज़ख्म और बहुत-सी चोटें,

इस प्रतिद्वन्द में खायी थीं |

तब भी सत्य और अहिंसा,

जैसी भी नीति अपनाई थीं |

आखिर इक दिन फिर वो बंधन,

टूट गया और चूर हुआ..

उस दिन फिर से इस चिड़िया ने,

अपने पर यूँ खोले थे |

अंग्रेजों ने चुप्पी साध ली,

फिर न वो कुछ बोले थे |

आज वो दिन है कि सोने की

चिड़िया आकाश को छूती है |

इसको कोई छीन ना पाए,

ये तो अपनी विभूति है.. |