Category Archives: My own

Post # 36

जीवन का सच

समय वो नदी है, जो
बहती जाए, बहती जाए
नहीं किसी दरिया में समाए
जाने कब किसको बहा ले जाए

तन वो पूंजी है, जो
यूं तो रूह को है बसाए
पर कौन जाने, कौन बताए
कब ये किस मिट्टी मिल जाए

धन वो मैल है हाथ का
जाने कब किस पानी धुल जाए
फिर से आए, चित्त भर जाए
ना आए, दरिद्र कर जाए

मन वो पंछी है, जो
कभी कैद में ही फडफडाए,
कभी उडान भर के नभ छू आए
कभी काबू में है, कभी काबू कर जाए

संसार वो ठिकाना है अस्थायी,
जहां कोई पूरी सुविधा पाए
कोई मुश्किल से भूख मिटाए
पर जो भी आए, एक दिन जाए

बस एक रूह ही है अजर-अमर
एक तन छोडे, तो दूजे जाए
जो तन पाए, उस में जीवन भर दे
जो तन छोडे, उसे व्यर्थ कर जाए..

Post # 35

हाँ, मैं गलत हूँ

हाँ, मैं लगती ठहरी नदी हूँ,
भीतर शायद एक सदी हूँ..

सच है, जीवन एक छलावा..

जो दिखती पूरे होश में है,
ऐसी शायद एक मदी हूँ..


बादल की गरज में जो थमी है,
हाँ, मैं शायद वही नमी हूँ

सच है, पास हूँ तो पूरी नहीं

पर दूर हो तो अधूरा कर जाए,
ऐसी शायद एक कमी हूँ..


नहीं हूँ वो पानी जो,
जिस बर्तन में हो, ढल जाये

सच है, नहीं आता रंग में घुल जाना

पर अक्सर प्यासे को देख,
जो दयावान सी पिघल जाए

मैं.. शायद ऐसी बर्फ़ जमी हूँ..


नहीं हूँ वो पंछी जो,
नभ में पर फैलाये विचरता है

फिर भी, स्वच्छंद हूँ

मैं वो जीव हूँ जो
अंततः धरती पर ही आ के ठहरता है


मैं एक पुकार हूँ,
कभी धिक्कार, कभी सत्कार हूँ..

नहीं हूँ समय सी प्रगतिशील

हाँ मैं शायद ब्रह्माण्ड सी अटल हूँ..


अभावी है व्यक्तित्व मेरा
मेरे हर पहलू में कमी सही..

पर फिर, कौन है यहां जो दोषी नहीं?
कौन है जिस ने कभी कोई भूल की नहीं


ये सब जान के भी जो कभी..
अपने ही पक्ष में ना हुआ, मैं वो मत हूँ

क्या पाया है जग ने सही हो कर?
हाँ.. मैं तो गलत हूँ..

हाँ, मैं गलत हूँ |


Post # 34

क्या रहा?

उस दिन की गुफ्तगूं में जब
मैं कह बैठी दिल से –
शराफत का ज़माना नहीं रहा,
कोई नादानी का दीवाना नहीं रहा

दिन सुहाना नहीं रहा,
कोई झूठ सच से अंजाना नहीं रहा
ये नहीं रहा, वो नहीं रहा
फलाना ढिमकाना नहीं रहा.. 😛

दिल ने कुछ देर गौर से सुना, 
कभी नज़रें मिलायीं, कभी चुरायीं
फिर मासूमियत से पूछा
एक गहरा सवाल – क्या रहा?

सोच में पड़ गयी मैं,
कुछ बोलते ना बना
खुशियाँ-ग़म, सुख-दुःख को
एक तराज़ू में तोलते ना बना

उलझन ही हैं ये सवाल जवाब, 
क्या रखा है इन बातों में
खूब झाँका खुद के अंदर, 
लेकिन खुद को टटोलते ना बना

क्या रहा, क्या रहा, क्या रहा ? 🤔
उस वक़्त तलाशती रही जवाब..
बिन ढूंढें मिला है आज –
बाकी हैं कुछ ख्वाब

पहले जैसे आसमां छू लेने के नहीं
तो ना सही, मुलाकात करनी है खुद से
अपनी परिभाषा लिखनी है चंद शब्दों में
भले ही लिख ना पाऊं किताब |

Post # 33

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गुफ्तगूं

🙂 दिल, छोड़ दे अब ये मासूमियत,

कि शराफ़त का वो ज़माना नहीं रहा..

जिस कारवां को नाज़ होता था तुझ पर,

उस में कोई नादानी का दीवाना नहीं रहा..

कहते हैं सब, होने लगी है शब,

उम्मीद भरा वो दिन सुहाना नहीं रहा..

नकाबों के इस दौर में, हर चेहरे पे पर्दा है,

झूठ कोई, इस सच से अंजाना नहीं रहा..

अपने हैं ख्वाब और जैसे बस ख्वाब ही अपने हैं,

इन में से एक भी बेगाना नहीं रहा..

 

🤔 पर फिर.. वो दिल भी क्या, जिस में,

दुनिया भर के ग़म का ठिकाना नहीं रहा..

नासमझी नहीं रही, मासूमियत नहीं रही,

अपने पराये का अफसाना नहीं रहा |

Post # 32

एक ख़ास शाम

आज ‘भूमिका’ एक दशक बाद पेंटिंग करने बैठी थी | ऑइल पेंटिंग – जो किसी ज़माने में उस की मनपसंद हुआ करती थी | और उस की एक-एक पेंटिंग पर परिजनों और सखी-सहेलियों की दर्जनों वाहवाही मिला करती थीं | उन चंद तारीफों में आज की सैंकड़ों-हज़ारों सोशल मीडिया लाइक्स से कहीं ज़्यादा अपनापन और आनंद था | बाद में ज़िंदगी की भाग दौड़ में वो यह कला जैसे भुला ही बैठी थी | आज उस के हाथ जैसे पेंटिंग बनाने को चलते ही नहीं बन रहे थे | कोई अच्छा आईडिया भी आ के नहीं दे रहा था | वह अचरज में थी |

‘बीप बीप्’ पास ही रखे उस के स्मार्टफोन में एसएमएस आया था जिस में पतिदेव ‘अहम्’ कह रहे थे ‘आज शाम का वादा याद है न?’ भूमिका मंद-मंद मुस्कुरा दी |’बीप बीप’ एक और एसएमएस आया था ‘मैं रास्ते में ही हूँ | पहुंचने में दस मिनट से ज़्यादा नहीं लगेंगे |’

भूमिका उठ कर किचन में गई और फटाफट दो कप चाय बना ली | इतने में डोरबेल बज गई | पीपहोल से झाँक कर देखा तो सामने अहम् को ही पाया |

‘मुझे वादा बिलकुल याद है !’ भूमिका दरवाज़ा खोलते ही चहक कर बोली |

‘अच्छा, तो दिखाओ अपना फ़ोन, करो स्विच ऑफ और रखो लाकर में !’ प्रत्युत्तर में अहम् भी चहका |

‘आप भी अपना फ़ोन निकालें जनाब |’ भूमिका ने फ़रमाया |

‘क्या तुम भी’ कह कर हँसते हुए अहम् ने भी अपना फ़ोन सामने कर दिया |

दोनों ने अपना-अपना फ़ोन स्विच ऑफ किया और दोनों फ़ोन लॉकर में रख दिए गए | फिर दोनों बालकनी में पहुंच गए जहां चाय इंतज़ार कर रही थी | ऐसा ही तय हुआ था, यही उन का एक-दूसरे से वादा  था | दोनों एक-एक कुर्सी ले कर बैठ गए | आज अरसे बाद दोनों एक दूसरे के साथ को आत्मिक तौर पर महसूस कर पा रहे थे | बिलकुल वैसे जैसी उम्मीद की थी | आज कोई बीप-बीप, कोई रिंगटोन उन की बातों में खलल नहीं डाल रहे थे | आज वो दोनों फ़ोन की स्क्रीन में नहीं, एक-दूसरे में खोये थे | यह सुकून शादी के चार साल में पहली बार था | इतनी देर में बारिश शुरू हो गई | दोनों थोड़ा भीगे और अंदर आ गए | अहम् फ्रेश हो कर रिलैक्स करने चला गया | और भूमिका ? वह वापस अपनी पेंटिंग की ओर | अब उस के दिमाग में आईडिया भी था और हाथ भी पेंटिंग करने को चल पड़े थे | वह एक बार फिर से एक लाजवाब ऑइल पेंटिंग तैयार कर के खूब सारी वाहवाही बटोरने को उत्सुक थी | एक ख़ास शाम ने उस की सोई रचनात्मकता जगाने में ‘अहम् भूमिका’ निभाई थी |